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कोरोना के कारण बुन्देलखण्ड उत्पन्न परिस्थिति से राज एवं समाज को मिलकर निपटना होगा - संजय सिंह

कोरोना के कारण बुन्देलखण्ड उत्पन्न परिस्थिति से राज एवं समाज को मिलकर निपटना होगा - संजय सिंह

कोरोना के कारण बुन्देलखण्ड उत्पन्न परिस्थिति से राज एवं समाज को मिलकर निपटना होगा - संजय सिंह


बुन्देलखण्ड में कोरोना (कोविड-19) की जानकारी होली के बाद ज्यादातर लोगों को मालूम हुयी क्योकि होली के समय से ही समाचार पत्र एवं न्यूज चैनलों में इसकी जानकारी शुरू हुयी। होली के बाद से अंधिकाश किसान अपनी रबी की फसल की कटाई में ज्यादा व्यस्त था। होली का त्योहार इस इलाके में एक बडा त्योहार हैं अधिकांश मजदूर होली एवं रबी की फसल की कटाई के कारण अपने-अपने गांव आ गये थे। 18 मार्च को बुुन्देलखण्ड के टीकमगढ जिले के कलेक्टर ने 144 धारा लगाई गई एवं 22 मार्च को जनता कफ्र्यू एवं 24 मार्च को पहले लाॅकडाउन की घोषणा प्रधानमंत्री जी ने कर दी।
इसके बाद बडे पैमाने पर एनसीआर के इलाके में रह रहे, बुन्देलखण्ड के मजदूरों ने शहर छोडकर अपने-अपने घर के लिए पैदल यात्रा शुरू कर दी। लगभग बुन्देलखण्ड में 3 लाख मजदूर इस दौरान वापिस घर आये। इस बीच में हजारों मजदूर दिल्ली से झांसी के बीच में फंसे हुए थे जिनको प्रशासन के सहयोग से उनके इलाके तक पहुचाने में काम संस्था ने किया। लोगों को भरोसा था कि 14 अप्रैल तक कोरोना का प्रभाव कम हो जायेगा लेकिन अब लाॅकडाउन बढ जाने से उनकी परेशानी बढ रही है।
लाॅकडाउन की एकदम घोषणा के कारण लोग बडे शहरों से गांव में वापिस आये उन्हें ठेकेदारों द्वारा आधे-अधूरे रूपये मजदूरी में दिये गये, कुछ लोग होली के त्योहार के बाद काम करने के लिए गये थे वह वहां 8 दिन का काम ही नहीं कर पाये और वापिस घर आना पडा। गांव में  14 दिन तक उन्हें किसी ने गेंहू की कटाई पर भी नहीं लगाया।
मजदूूर न मिलने एवं लगातार खराब मौसम के कारण गेहूं की कटाई हेतु हार्वेस्टिंग मशीनों का उपयोग किया गया, जिससे लोगों को मजदूरी नहीं मिली। पिछले वर्षो में हार्वेस्टर 1200 रूपये टैंक के हिसाब से चलाये जाते थ्ेा लेकिन इस वर्ष 1800 रूपये टैंक के हिसाब से हार्वेस्टर चलाये गये। जिससे किसानों का नुकसान हुआ। फसल को हावेस्टिग से कटाइे होने के कारण पशुधन (गाय, बैल, भैस) के लिए भूसा की अब  परेशानी हो रही है। अब भूसा बनवाने के लिए अलग मशीनों चलाई जायेगी तो।  तो एक बार फिर किसान को रूपयों की परेशानी होगी। जिसके लिए लगभग 200 से 250 प्रति कुंतल की दर से किसानों को भुगतान करना होगा। क्यों पिछले वर्ष खरीफ की फसल भी नष्ट हा गयी थी।
बहुत से किसानों का गेंहू विक्रय हेतु सरकार में पंजीयन नहीं हो पाया  हैं छोटे किसानों को गेंहू बेचने की आवश्यकता हैं क्योंकि उसे साहूकार के रूपये देना है। गांव के बडे लोग 1500-1600 प्रति क्विटल गेंहू खरीद रहे है। जबकि सरकारी ने गेहूं क्रय की दर 1925 रूपये तय की है।
कोरोना पर सरकार का पूरा ध्यान है। सरकारी अस्पतालों में अन्य बीमारी वाले मरीजों को नहीं देखा जा रहा है। प्राइवेट डाॅक्टर अपने दरवाजे तक नहीं खोल रहे है। गांवों जागरूकता की कमी है। लोगों को विश्वास ही नही होता कि यह महामारी है। जिसके कारण किसी भी उम्र का व्यक्ति भी संक्रमित हो सकता है। जिसके लक्षण खांसी, जुखाम, बुखार है। एक ओर जहाँ जन सामान्य में इस महामारी से डर का माहौल हो गया है वही ग्रामीण क्षेत्र में इसके बचने के लिए लोग जागरूकता के अभाव में तांत्रिक विद्या पर भरोसा कर रहे है।
परमार्थ संस्था के प्रमुख संजय सिंह ने कहा कि इस महामारी से हमें डरना नहीं चाहिए, ना ही किसी भ्रामक बातों एवं तांत्रिक विद्या पर भरोसा करना चाहिए। शोशल मीडिया में फैलाई जा रही अफवाहों पर ध्यान ना देकर संक्रमण के  प्राथमिक लक्षणों के बारे में जानना चाहिए। सोशल डिस्टेसिंग एवं हाथो को बार-बार साबुन से साफ करते रखना चाहिए। हमें इस महामारी का सामना करने के लिए प्रशासन एवं सामाजिक संगठनों को एक साथ आना होगा। तत्कालिक एवं दीर्घकालिक उपायों पर कार्य करना होगा।

- डाॅक्टर संजय सिंह, परमार्थ सचिव

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