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कोरोना का असर समाज के विभिन्न वर्गो पर धीरे-धीरे दिखायी देने लगा

कोरोना का असर समाज के विभिन्न वर्गो पर धीरे-धीरे दिखायी देने लगा

कोरोना का असर समाज के विभिन्न वर्गो पर धीरे-धीरे दिखायी देने लगा

कोरोना के कारण हुये लाॅकडाउन का असर यू तो पूरे देश में विशेष तौर से बुन्देलखण्ड में समाज के निर्धनतम वर्ग पर सबसे अधिक देखने को मिल रहा है। बुन्देलखण्ड जहां पिछले दो दशक में 13 बार से अधिक सूखा का प्रभाव रहा है। जिसके कारण इस इलाके की आर्थिक स्थिति अत्यधिक खराब है। बुन्देलखण्ड में 80 फीसदी लघु एवं सीमांत किसान है। आज भी बुन्देलखण्ड में 46 प्रतिशत वर्षा आधारित कृषि है, जो मानसून के ऊपर ही निर्भर है। प्रतिकूल मौसम के कारण इस इलाके में कभी रबी की फसल खराब हो जाती है कभी खरीफ की फसल खराब हो जाती है। किसान को कभी भी दोनों फसलें ठीक से नहीं मिल पाती है। इस इलाके में औघौगिक क्षेत्र न्यूनतम है, 80 प्रतिशत आबादी कृषि पर आधारित है। लगातार कई वर्षो से कृषि के प्रभावित होने के कारण ही इस इलाके में पलायन सबसे ज्यादा बढा है। बुन्देलखण्ड में तीन तरह से पैसा कमा कर अपना गुजर करते है, पहला खेती, दूसरा बाहर से पैसा कमाता है वही तीसरा पशुपालन में दूध बेचकर कुछ आमदनी करके अपना साल भर का गुजारा करता है। अचानक हुये लाॅकडाउन के कारण बुन्देलखण्ड में निवास करने वाली आबादी का एक बडा हिस्सा संकट में है, जिसमें सभी जाति धर्मो के लोग है। पिछले एक महिने से सब्जी उगाने वाले किसान, हाट, बाजार बंद होने के कारण अपना उत्पादन ठीक से नहीं बेच पाये। नदी के किनारे सब्जी उगाने वाले अंधिकाश किसानों ने उचित रेट ना मिलने पर मेहनत कर उगाई सब्जियो का वही छोड दिया। बेतवा के किनारे अंधिकाश गांव में आपको यह दृश्य देखने को मिल जायेगा। नदियों के किनारे सब्जी उगाने वाले मल्लाह एवं कुशवाहा जाति के लोग इस व्यवसाय से जुडे है। वही बुन्देलखण्ड में आर्थिक रूप से कमजोर लोग सबसे अधिक विवाह गर्मियों की मौसम में ही करते है। ग्रामीण क्षेत्र में होने वाली शादियों में कुम्हार, माली, मनिहार (चूडी पहनाने वाले) साल भर की अपनी कमाई करते है। इस वर्ष शादिया ंना होने के कारण इन सबके ऊपर बडा प्रभाव पड रहा है। अभी हाल में तो कोरोना का प्रभाव सिर्फ मजदूरों पर दिखायी दे रहा है लेकिन इसका सबसे ज्यादा असर लोवर मिडल क्लास के ऊपर दिखायी देगा। ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर सबसे ज्यादा असर कोरोना के कारण हुआ है। जिसका असर धीरे-धीरे दिखायी देने लगा है। बुन्देलखण्ड में मार्च, अप्रैल, मई सबसे महत्वपूर्ण समय होता है जब किसान अपने साल भर की आजीविका का इंतजाम करता है, तभी वह परेशान है। बुन्देली अर्थव्यवस्था के आधार पर पूरे साल की व्यवस्था का नियोजन इन्हीं दिनों में होता है। किसान फसल आने से कर्ज वापिसी करता है। साल भर की अपने बच्चों की पढाई, दवाई, कपडे खरीदने आदि का प्रबन्ध करता है, जो कोरोना के कारण प्रभावित है। बुन्देलखण्ड के वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता 86 वर्षीय रामकृष्ण शुक्ला कहते है कि कोरोना महामारी का प्रभाव बुन्देलखण्ड की अर्थव्यवस्था को पूरी तरह से चैपट कर दिया है। इसका असर लम्बे समय तक रहेगा। बुन्देलखण्ड का किसान वैसे ही प्रकृति से लड रहा है। उनके लिए यह दौर और भी अधिक घातक होगा। झांसी के सामाजिक कार्यकर्ता राजेश कुमार कहते है कि कोरोना का सबसे ज्यादा असर असंगठित क्षेत्र के लोगों के ऊपर पडा है बुन्देलखण्ड में मात्र 4 प्रतिशत लोग संगठित क्षेत्र में कार्य करते है। इसलिए इस इलाके में सबसे ज्यादा असर दिखायी दे रहा है। सरकार के द्वारा जो मदद दी जा रही है वह मजदूर वर्ग और समाज के निर्धनतम वर्ग दी जा रही है लेकिन बुन्देखण्ड में एक बडी आबादी का हिस्सा रोज खाने एवं कमाने वाला है। सामाजिक कार्यकर्ता राकेश गुरू कहते है कि प्रदेश सरकार को बुन्देलखण्ड जैसे इलाके में लोवर मिडिल क्लास के लिए भी आर्थिक सहायता देना चाहिए।

- डाॅक्टर संजय सिंह, परमार्थ सचिव

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