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बुन्देलखण्ड में हुयी बैमोसम बरसात ने रबी की फसल विशेष तौर से गेहूं के उत्पादन पर खासा असर डाला है

बुन्देलखण्ड में हुयी बैमोसम बरसात ने रबी की फसल विशेष तौर से गेहूं के उत्पादन पर खासा असर डाला है

बुन्देलखण्ड में हुयी बैमोसम बरसात ने रबी की फसल विशेष तौर से गेहूं के उत्पादन पर खासा असर डाला है

पिछले दिनों फरवरी और मार्च में बुन्देलखण्ड में हुयी बैमोसम बरसात ने रबी की फसल विशेष तौर से गेहूं के उत्पादन पर खासा असर डाला है। इस वर्ष गेहूं का उत्पादन पिछले वर्षो की अपेक्षा प्रति हैक्टेयर 10-15 कुन्तल कम हो रहा है। गेंहू की फसल की बारिस के कारण उपज कम हो गयी है। लगातार बारिस और तेज हवाओं ने गेंहू के दाने का कमजोर किया, जिसका असर अब गेंहू की मढाई के बाद दिखायी दे रहा है। बुन्देलखण्ड में गेंहूं का रकवा पिछले कुछ वर्षो में बहुत अधिक बढा है। वर्तमान में बुन्देलखण्ड के झांसी में रबी की फसल के कुल क्षेत्रफल में 60.9 प्रतिशत में गेंहू की फसल लेते है। इसी तरह ललितपुर में 64.5 प्रतिशत क्षेत्रफल में गेंहू की फसल लगाई जाती है, जालौन 53, हमीरपुर में 41, महोबा में 39, बांदा में 48, चित्रकूट में 30 प्रतिशत क्षेत्रफल में गेंहू की फसल होती है। निश्चित तौर से कम फसल होने से किसानों में निराशा है। झांसी के पालर, रनगंवा, मानपुर, चमराउआ, परगना, अमरउआ जालौन के पचैरा, भसूडा, अमीटा, सीकरी राजा, सौनेपुरा, सुरसादोगडी, अलीपुर हमीरपुर के मलेटा, मझगंवा, महोबा के चंदौली, बांदा के मरका, चित्रकूट के शिवरामपुर गांव में किसानों से जब गेंहू के फसल के बारे में पूछा गया तो इन गांवों में सभी ने गेंहू के उत्पादन में कमी बताई। जालौन के प्रगतिशील किसान इन्द्रजीत राजावत ने बताया कि गेंहू में 60 से 65 कुन्तल की प्रति हैक्टेयर की उपज होती थी। इस वर्ष 10 से 15 कुन्तल का उत्पादन कम हुआ है। गेंहू का मूल्य लगभग 1935 तय किया गया है। जिसके हिसाब से लगभग 20 हजार रूपये प्रति हैक्टेयर की दर से किसान का नुकसान हुआ है। मरेटा गांव के प्रगतिशील किसान संजय सिंह परिहार का कहना है कि गेंहू में लागत अधिक आती है। इस वर्ष कोरोना के कारण मजदूर एवं हार्वेस्टर भी बहुत मुश्किल में मिले है, ऐसे में कम उत्पादन किसान की आर्थिक संकट को और अधिक बढायेगा।
जालौन के प्रगतिशील किसान रामाराजा निरजंन का कहना है कि गेंहू में चमक और दाना कमजोर हुआ है। जिसके कारण बाजार में भी किसानों को परेशानी का सामना करना पड रहा है। झांसी के परगना गांव के किसान भानूप्रताप का कहना है कि बैमोसम बरसात के कारण इस तरह की परिस्थिति बनी है। सामाजिक कार्यकर्ता एवं जल जन जोडो अभियान के राष्ट्रीय संयोजक संजय सिंह का कहना है कि अधिक बारिस के कारण खरीफ की फसल अंधिकाश खत्म हो गयी थी, रबी की फसल से किसानों को बहुत आस थी लेकिन जलवायु परिवर्तन के कारण लगातार हुयी बारिस से रबी की फसल में कम उत्पादन हुआ।  
बुन्देलखण्ड ही नहीं पूरे उत्तर भारत में गेंहू की फसल बडे पैमाने पर प्रभावित हुयी है। इस वर्ष राष्ट्रीय स्तर पर भी गेंहू के कम उत्पादन का असर दिखायी देगा। जिस तरह से मौसम का मिजाज बदल रहा है वह आने वाले समय में किसानों के लिए सबसे बडा संकट हैै। इसके लिए किसानो को फसल चक्र को मौसम चक्र के साथ जोडना होगा। उसी के अनुरूप फसले लगानी होगी तभी जाकर किसान खुशहाल हो सकता है। बुन्देलखण्ड जैसे इलाके में 80 प्रतिशत आजीविका का आधार कृषि है ऐसे इलाकों में किसानों को प्राकृतिक खेती की तरफ आगे बढने की जरूरत है। जिससे खेती में लागत कम आये और मुनाफा अधिक हो। इसके लिए किसानों को अपने खेती करने की पद्धतियों को बदलना होगा। कृषि विश्वविधालयों एवं शोेध संस्थाओ को किसानों को मानस स्तर बढाने मे सहयोग करना होगा।

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