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बुंदेलखंड में जल संचयन के तरीके सिखा रहा हूं

बुंदेलखंड में जल संचयन के तरीके सिखा रहा हूं

बुंदेलखंड में जल संचयन के तरीके सिखा रहा हूं

संजय सिंह (परमार्थ सचिव )

बुंदेलखंड जल संकटग्रस्त क्षेत्र है। हर साल पड़ने वाले सूखे के कारण यहाँ पर खेती किसानी संकट में है। सूखे से यहां का समाज बुरी तरह प्रभावित है। हम इससे बच नहीं सकते हैं, लेकिन अपनी आदतों में थोड़ा बहुत सुधार करके कम पानी में भी अपनी बुनियादी जरूरते पूरी जरूर कर सकते हैं। मेरा बचपन बुंदेलखंड के अति पिछड़े इलाके हमीरपुर जिले के मलेहटा गांव में बीता। मेरा परिवार मध्यवर्गीय है। उस समय मेरे घर के सभी लोग पानी भरते बाहर जाते थे। में खुद बचपन में आठ किलोग्राम की रस्सी लेकर घर से कुछ दूर साठ हाथ गहरे कुएं से पानी भरने जाता था। पानी भरने का काम करने के बाद अक्सर हम थक जाते थे, लेकिन पानी ज्यादा जरूरी है. यही सोचकर हार नहीं मानते थे। मुझे बचपन से ही पानी की बचत करने की आदत पड़ गई। मैंने अपने ही तरह दूसरों को भी पानी के लिए जद्दोजहद करते देखा। तभी से मेरे दिमाग में यह बात बैठ गई कि हमें पानी बचाने के लिए कुछ करना होगा। इसलिए अब मैने जल संचयन को अपने जीवन का मिशन बना लिया है।

स्कूल-कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद मैंने अपना पूरा जीवन बुंदेलखंड के ग्रामीण इलाकों से जल संकट दूर करने के प्रति समर्पित कर दिया। सबसे पहले मैंने बुंदेलखंड के 14 जिलो की यात्रा की। यात्रा के दौरान मैंने लोगों की परेशानियां बेहद नजदीक से देखी-सुनी। गोवो, शहरों व कस्यों की समस्याएं देखी। सूखा प्रभावित इस क्षेत्र की ज्यादातर नदिया, तालाब और कुएं सूख रहे हैं या सूख चुके है। पानी न होने के कारण फसल तक नहीं हो पाती, जिससे किसान कर्ज में डूबकर आत्महत्या कर रहे हैं, मैंने परमार्थ समाज वहीं युवा अपना घर चलाने के लिए पलायन सेवी नाम से एक करने को मजबूर हो रहे हैं। यह समस्या एक दो संस्था बनायी, दिनों की नहीं दो दशक से ज्यादा की है। बाद में मैंने देश-विदेश की यात्रा कर जल संकट को जिसका काम जल नजदीक से देखा। हर जगह मुझे सबसे बड़ी संचयन के प्रयास समस्या पानी ही दिखी। जहाँ पर ज्यादा पानी है. को बढ़ाना है। वहाँ भी देखा कि लोग पानी के महत्व को नहीं समझ रहे। बुंदेलखंड में पानी बचाने व संरक्षण की शुरूआत मैने घर की महिलाओं से की, क्योंकि, पानी की परेशानी सबसे ज्यादा वही झेलती हैं। मैने महिलाओं के कुछ समूह बनाए, जिन्हें जल सहेलियां कहकर बुलाया जाता है। ये सामान्य महिलाएं ही है, जो अन्य लोगों से थोड़ा कम पढ़ी-लिखी हैं. लेकिन उन्हें बस एक चीज पता है कि हमें पानी को अमृत के समान समझना है। उसे खर्च करने के कुछ नियम बनाने हैं। जल सहेलियों को जल साक्षरता का ज्ञान है। वर्ष 1995 में मैंने परमार्थ समाज सेवी नाम से एक संस्था गठित की, जिसका काम सूखे बुंदेलखंड में जल संचयन के प्रयास को बढ़ाना है। मैंने सैकड़ों गांवों में जल साक्षर कार्यकर्ता तैयार किए, जिन्होंने जल संचयन को लेकर जल सुरक्षा के लिए योजनाएं बनाई। चैकडैम, कच्चे बांध, तालाब, व बोरवेल रिचार्ज आदि पर काम किया, नदियों को बचाने के लिए नदी यात्रा निकाली। धीरे-धीरे इसका असर महिलाओं पर पड़ा। वे आगे आई और उन्होंने खुद पानी को लेकर अपनी लड़ाई शुरू की। हमने उनकी बस इतनी मदद की कि उन्हें संगठित होने के फायदे, समझ व तरीका बताया। मेरे काम से प्रभावित होकर जलपुरुष राजेंद्र सिंह ने मुझे जल जन जोड़ो अभियान का राष्ट्रीय संयोजक बना दिया। अब परे बंदेलखंड के दो सौ से अधिक गांवों में 746जल सहेलियां काम कर रही हैं। वे जल संरक्षण, कुओं को गहरा करना, तालाबों का जीर्णोद्धार करना, छोटे बांध बनाना, हैडपंप सुधारना, प्रशासनिक अधिकारियों से मिलना और ज्ञापन देना अदि काम करती हैं। जल सहेलियों ने चंदेलकालीन तालाबों का भी जीर्णोद्धार किया है।

 

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