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बुन्देलखण्ड में जल एवं आजीविका संकट पलायन का प्रमुख कारण बना

बुन्देलखण्ड में जल एवं आजीविका संकट पलायन का प्रमुख कारण बना

बुन्देलखण्ड में जल एवं आजीविका संकट पलायन का प्रमुख कारण बना

पिछले दिनों कोरोना के कारण पहली बार बुंदेलखंड में रिवर्स माइग्रेशन देखने को मिला। एक आंकडे के अनुसार इस बार बुन्देलखण्ड में लगभग 3 लाख मजदूरों ने घर वापसी की। उनसे बात करने पर पता चल रहा है कि वह अपने गांव में ही रहना चाहते हैं। लेकिन उसके लिए उन्हें आजीविका के साधनों की जरूरत है, जिसके लिए सबसे अधिक पानी की।

बुंदेलखंड अपनी विशेष बसावट और ऐतिहासिक संदर्भों में अपनी विशेष पहचान रखता है। बुंदेलखंड क्षेत्र अपने गौरवमयी इतिहास में धरोहरों को समेटे हुए है, जिससे आज भी बुंदेलखंड की पहचान होती है। बुंदेलखंड में परम्परागत जल संसाधनों को संरक्षित करने की तत्कालीन राजाओं की जो व्यवस्था थी। जिसे बाद में चंदेली और बुंदेली जल संरचनाओं के रूप में जाना जाता है। नौवीं शताब्दी से लेकर 18 वीं शताब्दी तक बुंदेलखंड में तालाब, बावड़ी, पोखर बनाने तत्कालीन राजाओं की प्राथमिकता थी उन राजाओं ने बहुत तालाबों का निर्माण अपनी प्रजा को सुखी संपन्न बनाने के लिए किया, बाद में जब यह क्षेत्र अंग्रेजों के अधिपत्य में आया तब उन लोगों ने इन तालाबों से राजस्व वसूलने के लिए कैनाल सिस्टम विकसित किया।

18 वीं सदी से लेकर आजादी के बाद आज भी इनमें से कुछ तालाबों में कैनाल सिस्टम बहुत अच्छे ढंग से काम कर रहा है, लेकिन इन तालाबों की जो श्रृंखला थी, उनमें से अधिकांश तालाब अतिक्रमण के शिकार हो गए, जिसके कारण वह अपने अस्तित्व को ही खो बैठे। लालची मानवीय स्वभाव ने इन तालाबों को बर्बाद कर दिया। बुंदेलखंड में आज भी परम्परागत तालाब लोगों की जीविकोपार्जन एवं जल संरक्षण में अपना महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। धरती के प्रथम सतह के पानी के स्तर को बनाए रखने में इन जल संरचनाओं का विशेष योगदान है। लेकिन जैसे-जैसे यह जल संरचनाएं खत्म हुई वैसे वैसे इस इलाके में पानी का संकट बढ़ता गया।

वर्ष 2000 के बाद से इस इलाके में लगातार सूखे की मार है। पिछले 20 सालों में 13 बार इस इलाके मे गंभीर सूखा रहा है।  वर्ष 2005, 06, 07, 08 सूखे के वर्ष रहे हैं, जिससे सबसे अधिक पलायन इस इलाके में हुआ। इस पलायन के पीछे सबसे बड़ा कारण जल संकट और आजीविका के संसाधनों का अभाव है।
आजीविका के संसाधनों का क्रम देखें तो इस इलाके में आजीविका का प्रमुख आधार कृषि है, कृषि के लिए अच्छी जमीन और पानी चाहिए, बुंदेलखंड के कई इलाकों में इन दोनों संकट है, जिसके कारण लोग बेबसी में पलायन करते हैं, पिछले दो दशकों में पलायन का सबसे बड़ा केंद्र राष्ट्रीय राजधानी का क्षेत्र दिल्ली बना हुआ है। मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड से लाखों की तादात में मजदूर यहां रोजी रोटी की तलाश में जाते हैं। वह वहां निर्माण क्षेत्र में काम करते हैं। यह काम करते समय कई बार उन्हें अपनी जान भी जोखिम मे डालनी पडती है।

एक अध्ययन के अनुसार बुंदेलखंड से जाने वाले मजदूरों में प्रतिवर्ष 4 मजदूरों की मौत निर्माण कार्य के कार्यो के दौरान हो जाती है। इसी तरह से इनके साथ जाने वाले परिवार विशेष तौर से बच्चे शिक्षा से वंचित रह जाते है, महिलाएं जो इनके साथ जाती हैं वह है घरेलू कामों के साथ कामगार के रूप में काम करती हैं, कई बार उन्हें लालच और भय दिखाकर उनको उनके पति से छीन लिया जाता है। इस तरह की कई घटनाएं बुंदेलखंड में सुनाई दी है।

भले ही इस वर्ष सामान्य मानसून रहा हो लेकिन बुंदेलखंड के कई इलाकों में जल संकट गहरा गया है, हैण्डपम्पों ने पानी देना बंद कर दिया है, वहीं दूसरी तरफ लालची मानव स्वभाव मेंथा जैसी खेती को बढ़ावा दे रहा है, जिसके कारण जल स्तर बहुत तेजी से नीचे जा रहा है। बुंदेलखंड के दुर्दशा का सबसे अधिक कारण इस इलाके में बढ़ता जल संकट है, जो आने वाले समय में और अधिक भयाभय होगा। यूं तो बुंदेलखंड से कई प्रमुख नदियां होकर गुजरती हैं लेकिन इस इलाके में जल संकट फिर भी है। उसके पीछे बड़ा कारण यह है यह इलाका चट्टानों और पठार के ऊपर बसा हुआ है।  बुंदेलखंड को पानीदार बनाकर यहां के पलायन को रोका जा सकता है, यहां खुशहाली लाई जा सकती है एवं यहां के परिस्थिति तंत्र को भी ठीक किया जा सकता है।

बुंदेलखंड में कई सामाजिक संस्थाएं इस काम में लगी हुई है, उनमें से एक संस्था है परमार्थ समाज सेवी संस्थान जिसने अपने प्रयासों से बुंदेलखंड के एक सैकड़ा से अधिक गांवों को जल संकट मुक्त बनाया है। जल संकट के स्थाई समाधान के लिए स्थानीय समुदाय को जागरूक करने के लिए गांव-गांव में पानी पंचायत का निर्माण किया है। इन पानी पंचायतों की क्रियाशीलता के लिए जल सहेलियों का गठन किया गया है, जो निरंतर इन पानी पंचायतों में जल साक्षरता को बढ़ावा दे रही हैं साथ ही नदी घाटी संगठनों का निर्माण किया गया है, ताकि लोग संगठित होकर पानी के प्रबंधन और वितरण के बारे में समझ सके। गांव स्तर पर वाटर मास्टर प्लान बनाए गए हैं उनको पंचायत द्वारा लागू करवाने की कोशिश की गई है। बुन्देलखण्ड के कई क्षेत्रों मे संस्था के द्वारा जल सुरक्षा कार्ययोजना को बनाकर कार्य किया है एवं पानी के संरक्षण के कई स्थायी मॉडल प्रस्तुत किए हैं, जिसमें कम लागत के टिकाऊ मॉडल है। जैसे चेकडैम, अवरोध बांध, ग्रेवियन आदि।

संस्था द्वारा लगातार टिकाऊ और स्थाई विकास के लिए इन मॉडलों को बढ़ावा देने के लिए व्यापक जल जागरुकता का काम किया जा रहा है, उम्मीद है कि आने वाले समय में जल के प्रति लोगों में सजगता आएगी और इस इलाके से जल संकट दूर होगा

 

- डाॅक्टर संजय सिंह, परमार्थ सचिव

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