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आज सच में बुन्देलखण्ड में पृथ्वी, पृथ्वी दिवस मना रही है।

आज सच में बुन्देलखण्ड में पृथ्वी, पृथ्वी दिवस मना रही है।

आज सच में बुन्देलखण्ड में पृथ्वी, पृथ्वी दिवस मना रही है।

आज विश्व पृथ्वी दिवस है, बुन्देलखण्ड सहित पूरे विश्व में इन दिनों पृथ्वी के साथ न्यूनतम अत्याचार देखने को मिल रहे है। पूरे दुनिया की 8 अरब की आबादी है वर्तमान में 5 अरब से अधिक लोग लाॅकडाउन के कारण अपने घरो में है। इन दिनों विकास और प्राकृतिक संसाधनों का सोशण रूका हुआ है। जिसके कारण नदियां स्वच्छ हो गयी है। झीलों में पीओडी लेविल कम हो गया है। बुन्देलण्ड जहां पर धरती के कोख से सबसे अधिक पहाडों और नदियों से खनन का कार्य किया जाता है, जो वर्तमान में रूका हुआ है। जिसके कारण कबरई जैसी क्रैशर स्टोन की मण्डियों के इलाको में भी धुन्ध छठ गयी है। हवा में शुद्धता आ गयी है। मानवीय लालचीय स्वभाव ने बुन्देलखण्ड मे सैकडों फीट धरती क पेट को काट डाला है। जिसके कारण जहां पहाड थे आज वहा तालाब और कुओं जैसे दृश्य दिखायी दे रहे है। 1980 के पहले बुन्देलखण्ड में घने जंगल, विध्य की पर्वत श्रृखलाये, कलकल बहती नदियां, यहां के पर्यावरणीय संतुलन को बेहतर बनाये थी। बुन्देलखण्ड में राष्ट्रीय वनच्छादन के औसर के बराबर वन क्षेत्र थे वन आधारित आजीविका से आबादी का एक बडा हिस्सा पेट भरता था। साल भर वन क्षेत्र से कुछ ना कुछ जरूर मिलता रहता था। बुन्देलखण्ड में कृषि पशुपालन एवं वनोपज से यहां का समाज अच्छी जिन्दगी जीता था। बुन्देलखण्ड के इलाको में बडे-बडे चारागाह थे जहां पशु अपनी जरूरत पूरी कर लेते थे। गांव के एक हिस्से में जरूर कुछ वनक्षेत्र था जहां से लोगों की जरूरते पूरी होती थी। प्रत्येक गांव सुंदर तालाब थे। बुन्देलखण्ड में 153 छोटी नदिया थी जिनमें वर्षपर्यन्त पानी रहता था। प्राकृतिक खेती थी मोटे अनाज, जैसे ज्वार बाजरा, कोदो, कुटकी, समा जिसके कारण ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत थी। इन चार दशकों में यह सम्पूर्ण इलाका खनन आदि इस तरह से बढा कि बुन्देलखण्ड का वर्षा चक्र प्रभातिव हो गया और यह इलाका सूखा प्रभावित क्षेत्र में बदल गया। वही लालचीय मानवीय स्वभाव ने वनो को बडे पैमाने पर नष्ट किया तालाबों को अतिक्रमित किया। अधिक उत्पादन के चक्कर में रसायनिक खेती की शुरूआत हुयी यहां की प्राचीन सभ्यता एवं संस्कृति नष्ट हुयी एवं पलायन यहां की नियति बन गया। जल संकट दिन-प्रतिदिन बढता जा रहा है वनच्छादन क्षेत्र कम होता जा रहा है पहाड काटकर गिटटी बनायी जा रही है। नदियों से अन्धाधंुध खनन किया जा रहा है। एक सरकारी आंकडे के अनुसार बुन्देलखण्ड से प्रतिदिन 10 हजार से अधिक ट्रक बालू और गिटटी लेकर जाते है। पिछले एक महिने में बुन्देलखण्ड से बालू, गिटटी के खनन रूक जाने के बाद यहां की नदियों में स्वच्छता आ गयी है। जिसका उदाहरण आपको यह दिखायी देगा कि नदियों पर बडे पैमाने पर कछुऐं बाहर निकल रहे है। मछलियां झुण्ड में दिखायी दे रही है, गिद्ध एवं सारस भी दिखायी दे रहे है। झांसी के गांव डुमरई के धर्मपाल सिंह परिहार कहते है कि इन दिनो जंगली जानवर भी स्वतंत्र घूम रहे है। नदियों के किनारे पक्षिओं की खूब चहल, पहल दिखायी दे रही है। सामाजिक कार्यकर्ता सिद्धगोपाल बताते है कि माताटीला डैम में अब तक साईवेरियन पक्षी दिखायी दे रहे है। कानपुर आई आई टी के अर्थसांइस विभाग के विभागध्यक्ष राजीव सिन्हा के कहना है कि लाॅकडाउन के दोरान धरती के कंपन में कमी आयी है। यदि इसी तरह से प्रकृति के प्रति लोग व्यवहार करे तो धरती की सेहत अच्छी रहेगी। जल जन जोडो अभियान के राष्ट्रीय संयोजक संजय सिंह का कहना है कि वह अपने संगठन की ओर से भारत के प्रधानमंत्री को एक पत्र लिखेगे कि सारी नदियों की स्थिति सुधर गयी है। आप एक ऐसी व्यवस्था करे कि नदियां इसी तरह से निर्मल और अविरल रहे एवं हवा का स्तर भी ठीक रहे। 

- डाॅक्टर संजय सिंह, परमार्थ सचिव

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